जस्टिस नरीमन ने कहा कि पश्चिम बंगाल चुनावों में 90 लाख वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया

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सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज, जस्टिस नरीमन ने एसआईआर को लेकर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि इस बात का अफसोस है कि बंगाल में 90 लाख वोटरों के नाम हटाए जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर रोक नहीं लगाई। जस्टिस नरीमन ने कहा कि पश्चिम बंगाल चुनावों में 90 लाख वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित कर दिया गया। यह एक चौंकाने वाला आंकड़ा है। 90 लाख वोटरों का अधिकार छिन जाने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यह बहुत चिंताजनक बात

जस्टिस नरीमन ने आगे कहा कि जिन लोगों का अधिकार छीना गया, उनमें से लगभग 22 लाख वोटरों ने अपील की। ​​बाकी लोग शायद वे थे जिनके पास न्याय पाने के लिए जरूरी साधन नहीं थे। इन 22 लाख वोटरों में से, लगभग 1 लाख वोटरों की अपीलों में से 93 फीसदी फैसले वोटरों के पक्ष में आए। ऐसे में आप सोच सकते हैं कि यह आम आदमी, यानी भारत के नागरिक को पूरी तरह से गैर-कानूनी तरीके से बाहर करने जैसा था, ताकि सरकार अपनी मनचाही चीज़ हासिल कर सके। उन्होंने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल में हमने देखा कि इसने मौजूदा सरकार को हटा दिया और केंद्र की सरकार को सत्ता में ले आई। अब, ये बहुत ही चिंताजनक बातें हैं जो आज हमारे देश में हो रही हैं।

जस्टिस भुइयां ने भी उठाया सवाल

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान जज, जस्टिस उज्जवल भुइयां ने भी एसआईआर को लेकर बयान दिया था। उन्होंने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों का वोट देने का अधिकार छिन जाता है, तो ऐसी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी है। किसी भी तरह के तर्क या ‘अगर-मगर’ से इसे सही नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने कहा कि कोई भी अथॉरिटी ऐसा नहीं कर सकती, कोई भी अदालत इसे मंज़ूरी नहीं दे सकती। वहीं, कांग्रेस ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश उज्ज्वल भुइयां द्वारा मतदान के अधिकार को लेकर दिये गये बयान का हवाला देते हुए रविवार को दावा किया कि उनकी टिप्पणियों से यह साबित होता है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ने संविधान की भावना और उसके प्रावधानों का उल्लंघन किया है। विपक्षी दल ने कहा कि न्यायमूर्ति भुइयां की टिप्पणी ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को “पूरी तरह बेनकाब कर दिया है” और अब उनके पास पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह गया है।

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