विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूरोप में भारत और रूस संबंधों के बारे में बात की

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विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भारत और रूस के साथ रिश्तों पर खुलकर अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से मजबूत हैं क्योंकि रूस या सोवियत संघ ने उस दौर में भारत की मदद की थी कि जब भारत की क्षेत्रीय सुरक्षा और अखंड़ता के ऊपर खतरा मंडरा रहा था। उन्होंने सांकेतिक रूप से अमेरिका और यूरोप पर तंज कसते हुए कहा कि मॉस्को हमेशा नई दिल्ली के साथ खड़ा रहा है। ऐसे समय में भी जब पड़ोसी देश के सैन्य तानाशाही वाले शासन को बाहर से समर्थन मिल रहा था। जर्मनी में जारी एक कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए विदेश मंत्री जयशंकर ने कहा कि लोग अच्छा या बुरा इतिहास नहीं भूलते। उन्होंने कहा, “हर देश अपने अनुभवों के आधार पर रिश्तों को तय करता है। जिस तरह यूरोप रूस के बारे में भारत के नजरिए से नहीं सोच सकता। ठीक उसी तरह नई दिल्ली भी मॉस्को की तरफ से अपने फैसले यूरोप की नजर से नहीं कर सकता।” उन्होंने जोर देकर कहा कि हर देश अपने अनुभव के आधार पर दूसरे देशों के साथ अपने रिश्तों को तय करता है। भारत का मॉस्को को लेकर अनुभव हमेशा से सकारात्मक और सही रहा है।

रूस ने 20वीं सदी में भारत का किया समर्थन

विदेश मंत्री ने यहां पर सोवियत संघ की तरफ से 1950 के दशक में मिले समर्थन की तरफ इशारा किया। जब पश्चिमी देश एक सुर में पाकिस्तान की सैन्य तानाशाही शासन का समर्थन करते थे। इसके अलावा 1971 के युद्ध में भी जब अमेरिका ने भारत के खिलाफ अपने युद्धपोत भेजने का निर्णय ले लिया था। उस वक्त भी सोवियत संघ ने अपनी नौसेना को भेजा था।

समय के साथ गहरे हुए भारत और रूस के रिश्ते- विदेश मंत्री जयशंकर

बात को आगे बढ़ाते हुए विदेश मंत्री ने कहा कि दोनों देशों के रिश्ते समय के साथ और गहरे हुए हैं। उन्होंने कहा 1970 से 1980 के दशक में यह साझेदारी गहरी हुई। इसमें सैन्य परमाणु सहयोग और व्यापार भी शामिल रहा है। कई अन्य रिश्तों की तरह दोनों देशों के रिश्ते भी लगातार बदलाव के दौर से गुजरे हैं। अभी भी सैन्य हथियार, न्यूक्लियर सामान एक हिस्सा है। लेकिन अब दोनों देश बड़ी मात्रा में व्यापार भी करते हैं।

गौरतलब है कि रूस भारत के लिए कच्चे तेल का एक बड़ा सप्लायर बना हुआ है। अमेरिका समेत पूरा यूरोप इसके लिए नई दिल्ली को आंख दिखाते हुए नजर आता है। हालांकि, विदेश मंत्री एस जयशंकर कई बार रूस से तेल खरीदने के अपने फैसले पर सफाई देते और यूरोपीय देशों के दोहरे चरित्र को बताते हुए नजर आते हैं। अमेरिका ने इसी के चलते नई दिल्ली के ऊपर टैरिफ भी लगाया था। इसका जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय ने इसे अनुचित और बेबुनियाद करार दिया था।

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