जहरीली हवा सिर्फ फेफड़े ही नहीं, बल्कि दिमाग भी कर रही बीमार

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आमतौर पर आत्महत्या के पीछे पारिवारिक कलह, आर्थिक तंगी या मानसिक तनाव जैसी वजहों को जिम्मेदार माना जाता रहा है. लेकिन ब्रिटेन की क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के वैज्ञानिकों ने हाल ही में किए गए एक अध्ययन में एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा है. शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रदूषित हवा में सांस लेने वाले लोगों में खुदकुशी के विचार आने की आशंका काफी बढ़ जाती है. यह स्टडी जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रकाशित हुई है, जिसमें दुनियाभर के 29 बड़े शोधों का विश्लेषण करके यह समझने की कोशिश की गई कि वायु प्रदूषण का इंसानी दिमाग और मानसिक सेहत पर कैसा असर पड़ता है.

किस यूनिवर्सिटी ने किया यह अध्ययन?

वायु प्रदूषण और मानसिक सेहत के इस खतरनाक संबंध को समझने के लिए ब्रिटेन की क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन किया है. वैज्ञानिकों ने इस प्रभाव को गहराई से समझने के लिए दुनिया भर के करीब 29 प्रमुख शोधों का बारीकी से विश्लेषण किया गया. इस स्टडी में यूरोप, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, चीन, ताइवान, जापान और कोलंबिया जैसी जगहों से जुड़े डेटा को शामिल किया गया. इस जांच में पाया गया कि हवा में मौजूद जहरीले कण न सिर्फ हमारे फेफड़ों को सड़ाते है, बल्कि सीधे हमारे दिमाग पर हमला करते हैं. 

कौन से प्रदूषक तत्व है सबसे ज्यादा खतरनाक?

शोध में सामने आया है कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण यानी पीएम 2.5 और पीएम 10 दिमाग में सूजन और तनाव बढ़ाने का काम करते हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इन कणों के सिर्फ कम समय के संपर्क में आने पर भी लोगों में आत्महत्या से जुड़े विचारों में बढ़ोतरी देखी गई. इसके अलावा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के लंबे समय तक संपर्क में रहने से डिप्रेशन और आत्मघाती सोच जैसी प्रवृत्तियां बढ़ती पाई गईं. 

इसके अलावा, रिसर्च में यह भी पाया गया कि वायु प्रदूषण के साथ-साथ आर्सेनिक, लेड और लिथियम जैसी भारी धातुओं से दूषित पानी भी दिमाग के न्यूरोलॉजिकल फंक्शन को नुकसान पहुंचाता है. इससे मस्तिष्क में पुरानी सूजन बनी रहती है और नसों को भी नुकसान होता है, जो आगे चलकर डिप्रेशन जैसी स्थितियों की वजह बन सकता है. शोधकर्ताओं ने सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और यहां तक कि ट्रैफिक के शोर को भी मानसिक तनाव बढ़ाने वाले कारकों में गिना है.

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युवाओं पर सबसे ज्यादा मंडरा रहा है खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया भर में हर साल 7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या के कारण अपनी जान गवां देते हैं. सबसे डराने वाली बात यह है कि 15 से 29 वर्ष के युवाओं में मौत की तीसरी सबसे बड़ी वजह खुदकुशी है. 

ऑस्ट्रेलिया के कर्टिन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ पॉपुलेशन हेल्थ के विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन वायु प्रदूषण और मानसिक विकारों के बीच संबंध को समझने की एक शुरूआती लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कड़ी है. अब तक यह माना जाता था कि खराब हवा सिर्फ दिल और फेफड़ो की बीमारियां देती है, लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि यह समाज के मानसिक ताने-बाने को भी अंदर से खोखला कर रही है. ऐसे में अब केवल सेहत ही नहीं, बल्कि पर्यावरण सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है. 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.

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About the author निर्जला गौड़

निर्जला गौड़ इस वक्त  ABP Live की लाइफस्टाइल डेस्क पर इंटर्न के तौर पर काम कर रही हैं. वह मंदसौर यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में अपनी डिग्री कर रही हैं. इससे पहले वह  EBNW Stories में कंटेंट राइटर के तौर पर इंटर्नशिप कर चुकी हैं. डिजिटल जर्नलिज्म और कंटेंट क्रिएशन में उनकी खास रुचि है. आसान, आकर्षक और रिलेटेबल अंदाज में कहानियों को पेश करना और पाठकों तक जानकारी को प्रभावी तरीके से पहुंचाना उनकी खासियत है.

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Published at : 18 Sep 2026 09:13 AM (IST)

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Queens University Belfast Study

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क्वीन्स यूनिवर्सिटी की रिसर्च में खुलासा हुआ कि पीएम 2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के संपर्क में आने से बढ़ रहा सुसाइड का बड़ा जोखिम. आमतौर पर आत्महत्या के पीछे पारिवारिक कलह, आर्थिक तंगी या मानसिक तनाव जैसी वजहों को जिम्मेदार माना जाता रहा है. लेकिन ब्रिटेन की क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के वैज्ञानिकों ने हाल ही में किए गए एक अध्ययन में एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा है. शोधकर्ताओं का दावा है कि प्रदूषित हवा में सांस लेने वाले लोगों में खुदकुशी के विचार आने की आशंका काफी बढ़ जाती है. यह स्टडी जर्नल ऑफ एपिडेमियोलॉजी एंड कम्युनिटी हेल्थ में प्रकाशित हुई है, जिसमें दुनियाभर के 29 बड़े शोधों का विश्लेषण करके यह समझने की कोशिश की गई कि वायु प्रदूषण का इंसानी दिमाग और मानसिक सेहत पर कैसा असर पड़ता है.

किस यूनिवर्सिटी ने किया यह अध्ययन?

वायु प्रदूषण और मानसिक सेहत के इस खतरनाक संबंध को समझने के लिए ब्रिटेन की क्वीन्स यूनिवर्सिटी बेलफास्ट के शोधकर्ताओं ने एक बड़ा अध्ययन किया है. वैज्ञानिकों ने इस प्रभाव को गहराई से समझने के लिए दुनिया भर के करीब 29 प्रमुख शोधों का बारीकी से विश्लेषण किया गया. इस स्टडी में यूरोप, अमेरिका, दक्षिण कोरिया, चीन, ताइवान, जापान और कोलंबिया जैसी जगहों से जुड़े डेटा को शामिल किया गया. इस जांच में पाया गया कि हवा में मौजूद जहरीले कण न सिर्फ हमारे फेफड़ों को सड़ाते है, बल्कि सीधे हमारे दिमाग पर हमला करते हैं. 

कौन से प्रदूषक तत्व है सबसे ज्यादा खतरनाक?

शोध में सामने आया है कि हवा में मौजूद सूक्ष्म कण यानी पीएम 2.5 और पीएम 10 दिमाग में सूजन और तनाव बढ़ाने का काम करते हैं. चौंकाने वाली बात यह है कि इन कणों के सिर्फ कम समय के संपर्क में आने पर भी लोगों में आत्महत्या से जुड़े विचारों में बढ़ोतरी देखी गई. इसके अलावा नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के लंबे समय तक संपर्क में रहने से डिप्रेशन और आत्मघाती सोच जैसी प्रवृत्तियां बढ़ती पाई गईं. 

इसके अलावा, रिसर्च में यह भी पाया गया कि वायु प्रदूषण के साथ-साथ आर्सेनिक, लेड और लिथियम जैसी भारी धातुओं से दूषित पानी भी दिमाग के न्यूरोलॉजिकल फंक्शन को नुकसान पहुंचाता है. इससे मस्तिष्क में पुरानी सूजन बनी रहती है और नसों को भी नुकसान होता है, जो आगे चलकर डिप्रेशन जैसी स्थितियों की वजह बन सकता है. शोधकर्ताओं ने सल्फर डाइऑक्साइड, ओजोन और यहां तक कि ट्रैफिक के शोर को भी मानसिक तनाव बढ़ाने वाले कारकों में गिना है

युवाओं पर सबसे ज्यादा मंडरा रहा है खतरा

विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया भर में हर साल 7 लाख से अधिक लोग आत्महत्या के कारण अपनी जान गवां देते हैं. सबसे डराने वाली बात यह है कि 15 से 29 वर्ष के युवाओं में मौत की तीसरी सबसे बड़ी वजह खुदकुशी है. 

ऑस्ट्रेलिया के कर्टिन यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ पॉपुलेशन हेल्थ के विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन वायु प्रदूषण और मानसिक विकारों के बीच संबंध को समझने की एक शुरूआती लेकिन बेहद महत्वपूर्ण कड़ी है. अब तक यह माना जाता था कि खराब हवा सिर्फ दिल और फेफड़ो की बीमारियां देती है, लेकिन अब यह साफ हो चुका है कि यह समाज के मानसिक ताने-बाने को भी अंदर से खोखला कर रही है. ऐसे में अब केवल सेहत ही नहीं, बल्कि पर्यावरण सुरक्षा को सबसे ज्यादा प्राथमिकता देना अनिवार्य हो गया है. 

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

निर्जला गौड़ इस वक्त  ABP Live की लाइफस्टाइल डेस्क पर इंटर्न के तौर पर काम कर रही हैं. वह मंदसौर यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन में अपनी डिग्री कर रही हैं. इससे पहले वह  EBNW Stories में कंटेंट राइटर के तौर पर इंटर्नशिप कर चुकी हैं. डिजिटल जर्नलिज्म और कंटेंट क्रिएशन में उनकी खास रुचि है. आसान, आकर्षक और रिलेटेबल अंदाज में कहानियों को पेश करना और पाठकों तक जानकारी को प्रभावी तरीके से पहुंचाना उनकी खासियत है.

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