सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए बंगाल में उन वोटरों के नाम बहाल किए, जिनकी अपीलें मंजूर हो गईं

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13 करोड़ लोगों के नाम कटे, उनमें से कितने वाकई मृत थे और कितने जिंदा. चुनाव आयोग ने ताजा अपडेट में उन 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक ‘स्पेशल ड्राइव’ शुरू करने का आदेश दिया है, जहां स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पूरा हो चुका है. इस ड्राइव का मकसद उन वोटरों के नाम दोबारा जोड़ना है, जो मतदाता सूची से बाहर रह गए. साथ ही पहली बार वोट डालने वाले युवा वोटरों के नाम भी जोड़े जाएंगे. यह आदेश 29 सितंबर 2026 को लिखित में सभी राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों को भेजा गया और 1 अक्टूबर 2026 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में दोबारा दोहराया गया. यह पूरा मामला इतना सीधा नहीं है. पहले 13 करोड़ से ज्यादा नाम काटे गए और अब जोड़ने की बात हो रही है. आखिर चुनाव आयोग ने नाम काटो और जोड़ो का कैसा तमाशा लगा रखा है…

संविधान के तहत चुनाव आयोग का काम क्या है?

संविधान का अनुच्छेद 324(1) साफ कहता है कि संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार करने का पूरा अधिकार और नियंत्रण चुनाव आयोग के पास है. यानी मतदाता सूची को सही रखना चुनाव आयोग की जिम्मेदारी है. मृत वोटरों के नाम हटाना, दो जगह रजिस्टर्ड नाम हटाना, या जो लोग पलायन कर गए उन्हें हटाना आयोग के काम का हिस्सा है.

सवाल यह है कि यह काम किस तरीके से किया जा रहा है और इससे कितने सही वोटरों का नाम गलती से कट गया.

SIR से 13 करोड़ नाम क्यों कटे?

SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन एक खास प्रक्रिया है जिसमें मतदाता सूची की घर-घर जाकर जांच होती है. यह प्रक्रिया जून 2025 में शुरू हुई थी. अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं. दिल्ली में सबसे ज्यादा 33 प्रतिशत नाम कटे हैं.

इनमें से 71.5 प्रतिशत यानी लगभग 9.5 करोड़ नाम इस आधार पर हटाए गए कि वे ‘अनुपस्थित’ हैं, ‘स्थायी रूप से शिफ्ट’ हो गए हैं या ‘अन्य कारणों’ से हटाए गए. करीब 2.8 करोड़ नाम मृत वोटरों के थे और लगभग 1 करोड़ नाम एक से ज्यादा जगह रजिस्ट्रेशन के कारण हटाए गए.

गौर करने वाली बात यह है कि 9.5 करोड़ वोटर फॉर्म 6 भरकर दोबारा नाम जुड़वा सकते हैं, लेकिन मृत या डुप्लीकेट श्रेणी वाले वोटर दोबारा नहीं जुड़ सकते.

नाम काटने की कानूनी प्रक्रिया क्या है?

कानून के मुताबिक, किसी भी वोटर का नाम काटने से पहले उसे नोटिस देना जरूरी है. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 22 के तहत इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ERO) को यह तय करना होता है कि किसी व्यक्ति का नाम मरने, स्थायी रूप से शिफ्ट होने या डुप्लीकेट होने के कारण हटाया जाए. इसमें सुनवाई का मौका देना भी जरूरी है.

असली विवाद यहीं से शुरू होता है. बॉम्बे हाई कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को साफ कहा कि SIR के तहत बनी ड्राफ्ट रोल किसी का नाम काटने का आधार नहीं बन सकती. कोर्ट ने यह भी कहा कि सॉफ्टवेयर कानून से ऊपर नहीं हो सकता. गोवा की एक फैमिली का केस सामने आया, जिसमें फॉर्म 8 भरने के बाद भी परिवार के छह सदस्यों के नाम काट दिए गए थे. कोर्ट ने चुनाव आयोग की इस कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए.

नाम दोबारा कैसे जुड़ेगा?

जिन राज्यों में SIR पूरा हो चुका है, वहां अब फॉर्म 6 के जरिए नाम दोबारा जोड़ा जा सकेगा. जुलाई 2026 में फॉर्म 6 में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई थी, जिसमें पूछा जाता था कि आवेदक या उसके माता-पिता पिछले SIR के बाद मतदाता सूची में थे या नहीं. अब यह घोषणा हटा दी गई है.

बूथ लेवल अधिकारियों (BLO) को निर्देश दिया गया है कि वे SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों का मिलान करें और जो नाम गलती से छूट गए हैं उन्हें खोजें. हर BLO को हफ्ते में 20 से 25 वोटरों को कवर करने का लक्ष्य दिया गया है, ताकि यह काम एक महीने में पूरा हो जाए. BLO घर-घर जाकर फॉर्म 6 भरवाएंगे और जरूरी दस्तावेज जमा करने में मदद करेंगे.

अरे तो यह नाम काटो और जोड़ो का तमाशा ही क्यों?

बीजेपी का तर्क है कि SIR में हटाए गए 13 करोड़ नामों में से 2.8 करोड़ मृत वोटर थे. लेकिन जब 13 करोड़ में से सिर्फ 2.8 करोड़ ही मृत निकले, तो बाकी 10 करोड़ से ज्यादा नाम आखिर किस आधार पर काटे गए? कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने ठीक यही सवाल उठाया है, ‘अगर 2.8 करोड़ मरे हुए लोग लिस्ट में थे, तो 2014 से चल रहे सालाना रिवीजन इतने खराब क्यों थे?’

पॉलिटिकल एनालिस्ट और VoteVibe के फाउंडर अमिताभ तिवारी कहते हैं, ‘SIR को लेकर चुनाव आयोग कह रहा है कि यह मतदाता सूची की ‘सफाई’ है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यह पूरी कवायद एक ऐसी इलेक्शन इंजीनियरिंग का हिस्सा है, जिसमें पहले सिस्टम के जरिए कमजोर, गरीब और खास समुदायों के नाम काटे गए और अब ‘जोड़ो’ अभियान चलाकर यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि कुछ गलत नहीं हुआ.’

13 करोड़ नामों में से करीब 9.5 करोड़ नाम ‘अनुपस्थित’, ‘स्थायी रूप से शिफ्ट’ या ‘अन्य कारणों’ से हटाए गए हैं. यानी सबसे बड़ा हिस्सा उन लोगों का है, जो अपनी जगह पर ही रह रहे हैं, लेकिन सिस्टम ने उन्हें ‘गैरहाजिर’ या ‘शिफ्टेड’ बता दिया.

SIR विरोधी गठबंधन और नागरिक वोट संरक्षण समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, जिन लोगों को ‘शिफ्टेड’ बताकर काटा गया, उनमें से कई उसी पते पर रह रहे थे और उन्होंने एन्यूमरेशन फॉर्म भी जमा कर दिया था. बेंगलुरु की एक लोकैलिटी में तो 1,300 में से 826 लोगों को ‘शिफ्टेड’ बताकर काट दिया गया, जबकि वे वहीं रह रहे थे.

अमिताभ तिवारी ने कहा, ‘नाम काटने का बहाना सफाई है, जबकि कई लोग उसी पते पर रह रहे थे और उन्होंने फॉर्म भी भर दिया था. यानी पहले सॉफ्टवेयर ने नाम काटा, फिर नागरिक को खुद साबित करना पड़ रहा है कि वह जिंदा है. अब जोड़ो अभियान इसलिए चल रहा है ताकि यह दिखाया जा सके कि देखो, हम तो नाम जोड़ भी रहे हैं, कोई गलत नहीं हुआ. 13 करोड़ लोग परेशान हुए लोगों में जिनके पास दस्तावेज और संसाधन हैं, वे अपील कर लेंगे. जो नहीं कर सकते, वे चुपचाप सिस्टम से बाहर हो जाएंगे. इस तमाशे का मकसद सफाई नहीं, सियासी फायदा लगता है.’

मतदाता सूची को सही रखना चुनाव आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है. इस वजह से जब 13.3 करोड़ नाम हटाए गए, तो इसकी जवाबदेही सबसे पहले आयोग की बनती है. हालांकि, आयोग के अंदर भी इस प्रक्रिया को लेकर टकराव सामने आ चुके हैं.

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