बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महिला की ओर से पति और उसके पांच रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज कराई गई एफआईआर रद्द कर दी

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कोर्ट ने कहा कि महिला से कपड़े और बर्तन धुलवाने का आरोप भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत वैवाहिक क्रूरता का अपराध नहीं बनता। अदालत ने यह भी पाया कि पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के थे, जिनसे कोई दंडनीय अपराध साबित नहीं होता। क्या है पूरा मामला?

बॉम्बे हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति अभय जे. मंत्री की पीठ पति और उसके पांच रिश्तेदारों की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें महिला की शिकायत के आधार पर दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी। कोर्ट ने एक अक्टूबर के अपने आदेश में कहा कि महिला से कपड़े और बर्तन धुलवाने का आरोप भले ही सही मान लिया जाए, लेकिन ये धारा 498A के तहत क्रूरता के अपराध में नहीं आते। महिला ने लगाए थे ये आरोप

महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि पति और उसके रिश्तेदार उसे बच्चा पैदा करने में असमर्थ होने और बांझ होने को लेकर ताने मारते थे। महिला के मुताबिक, वर्ष 2024 में उसका पति उसे एक रिश्तेदार के घर ले गया था, जहां उससे घर के कामकाज के तहत कपड़े और बर्तन धुलवाए गए। महिला ने यह भी आरोप लगाया था कि उसके साथ गाली-गलौज की गई और उसे घर से बाहर निकाल दिया गया।

पति के वकील ने क्या दलील दी?

पति और उसके रिश्तेदारों की ओर से पेश अधिवक्ता गणेश टी. जाधव ने अदालत में दलील दी कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोप अस्पष्ट, व्यापक और सामान्य प्रकृति के हैं। उन्होंने आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि शिकायत पति पर दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई थी, ताकि वह महिला को वापस अपने साथ रखने के लिए मजबूर हो। वहीं, राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता प्रियंका एस. राणे और अधिवक्ता कविता पी. शिंदे ने दलील दी कि पति ने महिला से अपने पिता के पास से चार पहिया वाहन लाने को कहा था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रिश्तेदारों के उकसाने पर पति ने महिला के साथ गाली-गलौज और मारपीट की थी। कोर्ट ने क्यों रद्द की एफआईआर?

हाईकोर्ट ने पाया कि पति और उसके रिश्तेदारों के खिलाफ कोई स्पष्ट और विशिष्ट आरोप नहीं थे। अदालत के अनुसार, शिकायत में लगाए गए आरोप सामान्य और अस्पष्ट थे। एफआईआर और आरोपपत्र में भी ऐसा कोई अपराध सामने नहीं आया, जिसके लिए आईपीसी की धारा 498A के तहत सजा दी जा सके।

अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि महिला के ससुराल पक्ष के लोग अलग-अलग शहरों में रहते थे और महिला उनसे बहुत कम मिलने जाती थी। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि मामले को आगे जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर अदालत ने पति और उसके पांच रिश्तेदारों के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द कर दी।

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