आइसलैंड के पास रिन्यूएबल एनर्जी की भरपूर मात्रा है. यहां कई ज्वालामुखी भी

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आइए जानते हैं कि क्या इन ज्वालामुखी का इस्तेमाल करके यह पूरी दुनिया को बिजली दे सकता है. Iceland Volcanoes: अपनी खास भौगोलिक स्थिति की वजह से आइसलैंड रिन्यूएबल एनर्जी के इस्तेमाल के मामले में दुनिया के प्रमुख देशों में से एक है. यह देश अपनी लगभग सारी बिजली रिन्यूएबल स्रोत से बनाता है. इसमें मुख्य रूप से जियोथर्मल और हाइड्रोइलेक्ट्रिक ऊर्जा शामिल है. अपनी जमीन के नीचे ज्वालामुखी और जबरदस्त जियोथर्मल गतिविधि होने की वजह से आइसलैंड के पास भारी मात्रा में प्राकृतिक गर्मी मौजूद है. लेकिन क्या इस ऊर्जा का इस्तेमाल सच में पूरी दुनिया को बिजली सप्लाई करने के लिए किया जा सकता है? आइए जानते हैं.

बिजली का एक्सपोर्ट 

सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है आइसलैंड और ज्यादा ऊर्जा की खपत वाले इलाकों के बीच की दूरी. बिजली को ट्रांसमिशन नेटवर्क के जरिए पहुंचाना पड़ता है. इसी के साथ लंबी दूरी तक ट्रांसमिशन करने से ऊर्जा का नुकसान होता है.  आइसलैंड उत्तरी अटलांटिक में स्थित एक द्वीप है. भारत अमेरिका या फिर एशिया के कुछ हिस्सों जैसे देशों को बिजली सप्लाई करने के लिए हजारों किलोमीटर लंबे समुद्र के नीचे ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत होगी. 

हालांकि आधुनिक हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन टेक्नोलॉजी बिजली को लंबी दूरी तक पहुंचा सकती है लेकिन ऐसे महाद्वीपों को जोड़ने वाले समुद्र के नीचे के नेटवर्क बनाना और उनका रखरखाव करना काफी ज्यादा महंगा और तकनीकी रूप से काफी ज्यादा मुश्किल होगा

आइसलैंड की जियोथर्मल ऊर्जा असीमित नहीं है 

आइसलैंड की आबादी लगभग चार लाख है. इसका मतलब है कि इसकी रिन्यूएबल बिजली का उत्पादन घरेलू जरूरत और एल्युमिनियम उत्पादक जैसे ज्यादा ऊर्जा की खपत वाले उद्योगों के लिए काफी है. 

हालांकि काफी सारे ज्वालामुखियों के होने का मतलब यह नहीं है कि आइसलैंड के पास इस्तेमाल लायक बिजली का असीमित भंडार है. जियोथर्मल संसाधन हर जगह अलग-अलग होते हैं और काफी ज्यादा तेजी से ऊर्जा निकालने से जमीन के नीचे के भंडार और उनकी लंबे समय तक बनी रहने की क्षमता पर असर पड़ सकता है. 

दुनिया में बिजली की मांग भी काफी ज्यादा है क्योंकि अरबों लोगों और उद्योगों को लगातार बिजली की जरूरत होती है. आइसलैंड अकेले इतनी बिजली पैदा नहीं कर सकता कि पूरी दुनिया के ऊर्जा सिस्टम को बदल सके. 

बिजली सीधे लावा से पैदा नहीं होती 

एक और आम गलतफहमी यह है कि पावर प्लांट बिजली पैदा करने के लिए बहते हुए लावा का इस्तेमाल कर सकते हैं. असल में जियोथर्मल बिजली आमतौर पर पृथ्वी की सतह के नीचे की गर्मी का इस्तेमाल करती है. 

जमीन के नीचे के गर्म पानी और भाप को सतह पर लाया जाता है या फिर गर्मी ट्रांसफर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसके बाद भाप जनरेटर से जुड़े टरबाइन को घुमा सकती है जिससे बिजली पैदा होती है. 

बहुत ज्यादा गर्मी उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकती है 

मैग्मा काफी ज्यादा तापमान पर पिघलती हुई चट्टान से बना होता है. मैग्मा चेंबर के करीब ड्रिलिंग करने से उपकरण, पाइप और ड्रिलिंग सिस्टम पर काफी ज्यादा थर्मल स्ट्रेस पड़ता है. जब वैज्ञानिक इन मुश्किल हालात वाली जगह पर पहुंचने की कोशिश करते हैं तो आम मशीनरी और मटीरियल के लिए गर्मी झेलना मुश्किल हो सकता है. उपकरण खराब हो सकते हैं या फिर काम करना बंद कर सकते हैं.

ज्वालामुखी से निकलने वाली गैस एक और समस्या पैदा करती है 

ज्वालामुखी वाले इलाकों में नुकसान पहुंचाने वाले केमिकल और गैस हो सकती है. यह चीज जियोथर्मल प्लांट में इस्तेमाल होने वाले मेटल के उपकरण, पाइप और दूसरे हिस्सों को नुकसान पहुंचा सकती हैं. 

इसका मतलब है कि ज्वालामुखी सिस्टम के पास चलने वाले पावर प्लांट को ऐसे खास मटीरियल और इंजीनियरिंग समाधानों की जरूरत होती है जो मुश्किल केमिकल और गर्मी वाले हालात में भी टिके रह सकें.

ज्वालामुखी के बारे में पहले से अंदाजा लगाना मुश्किल 

ज्वालामुखी वाले इलाकों में प्राकृतिक जोखिम भी होते हैं. भूकंप, टेक्निक हलचल और ज्वालामुखी फटने से इंफ्रास्ट्रक्चर को नुकसान हो सकता है और बिजली उत्पादन में रुकावट आ सकती है. यही वजह है कि ऐसे इलाकों में अरबों रुपये का पावर प्लांट बनाना काफी भारी आर्थिक जोखिम पैदा करता है. इस वजह से इंजीनियरों को जियोथर्मल प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले वहां की भू वैज्ञानिक स्थिति का ध्यान से आकलन करना पड़ता है

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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