कंपनी ने लैब में गोल्ड तैयार करने का किया दावा, क्या हीरे की तरह गिरेगी कीमत

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सोने की दुनिया में एक ऐसी तकनीक चर्चा में है, जो भविष्य में इस कीमती धातु की सप्लाई और कीमतों को प्रभावित कर सकती है। अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को की स्टार्टअप कंपनी Marathon Fusion ने दावा किया है कि उसने मर्करी यानी पारे को परमाणु प्रक्रिया के जरिए स्थिर सोने में बदलने का तरीका विकसित किया है। हालांकि, कंपनी ने अभी तक प्रयोग में तैयार हुए सोने की मात्रा और विस्तृत आंकड़े सार्वजनिक नहीं किए हैं। इसलिए इसे सोने की कीमतों में तत्काल गिरावट का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन, इस दावे ने ज्वेलरी बाजार में पहले से चल रही एक बहस को फिर चर्चा में ला दिया है। लैब-ग्रोन डायमंड्स की बढ़ती सप्लाई और कम कीमतों ने प्राकृतिक हीरों के बाजार को भी प्रभावित किया है। ऐसे में सवाल है कि क्या भविष्य में लैब में बना सोना भी पारंपरिक सोने के लिए वैसी ही चुनौती बन सकता है

लैब-ग्रोन डायमंड्स की कीमतें क्यों गिरीं?

लैब-ग्रोन डायमंड्स यानी प्रयोगशाला में तैयार किए गए हीरों की खासियत यह है कि इन्हें प्राकृतिक हीरों की तरह धरती से खनन करके नहीं निकालना पड़ता। नियंत्रित परिस्थितियों में तकनीक की मदद से इन्हें तैयार किया जाता है। इनकी रासायनिक संरचना और क्रिस्टल की बनावट प्राकृतिक हीरों जैसी हो सकती है, लेकिन इनके बनने की प्रक्रिया अलग होती है। लैब में बने हीरों की लोकप्रियता बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण इनकी कम कीमत रही है। समान साइज और क्वॉलिटी वाले कई लैब-ग्रोन हीरे प्राकृतिक हीरों के मुकाबले काफी सस्ते मिलते हैं। इससे उन ग्राहकों के लिए महंगे दिखने वाले आभूषण खरीदना आसान हुआ, जो कम बजट में बड़ा हीरा चाहते हैं।

लेकिन जैसे-जैसे इस तकनीक को अपनाने वाली कंपनियों की संख्या बढ़ी, बाजार में सप्लाई भी तेजी से बढ़ी। चीन और भारत जैसे देशों में उत्पादन बढ़ने से प्रतिस्पर्धा तेज हुई और लैब-ग्रोन डायमंड्स की कीमतों पर दबाव आ गया। रॉयटर्स की 23 अक्टूबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, डायमंड इंडस्ट्री के एनालिस्ट एडन गोलन ने बताया था कि एक और दो कैरेट के लैब-ग्रोन हीरों की औसत थोक कीमतें 2018 के बाद से 96% तक गिर चुकी थीं। वर्ल्ड डायमंड काउंसिल की तत्कालीन अध्यक्ष फेरियल ज़ेरूकी ने भी बढ़ती सप्लाई के कारण इन हीरों की लोकप्रियता और ग्राहकों के भरोसे पर दबाव पड़ने की बात कही थी। यह गिरावट दिखाती है कि जब किसी उत्पाद को तकनीक की मदद से बड़ी मात्रा में तैयार करना आसान होता है और सप्लाई मांग से आगे निकल जाती है, तो उसकी कीमत तेजी से नीचे आ सकती है।

प्राकृतिक हीरे भी क्यों हुए सस्ते?

लैब-ग्रोन डायमंड्स की चुनौती केवल उन्हीं तक सीमित नहीं रही। प्राकृतिक हीरों के कारोबार पर भी इसका असर देखने को मिला। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, प्राकृतिक हीरों की कीमतों में 2022 के मिड से गिरावट का दौर शुरू हुआ था। इसकी एक प्रमुख वजह लैब में तैयार हीरों की बढ़ती लोकप्रियता थी, खासकर युवा ग्राहकों के बीच। जब कम कीमत में समान साइज और दिखावट वाला विकल्प मिलने लगा, तो कुछ ग्राहकों ने प्राकृतिक हीरों के बजाय लैब-ग्रोन डायमंड्स को प्राथमिकता दी। हालांकि, प्राकृतिक हीरों की कीमतों में गिरावट के पीछे सिर्फ लैब-ग्रोन डायमंड्स ही जिम्मेदार नहीं थे। कमजोर उपभोक्ता मांग, बाजार में उपलब्ध स्टॉक और ज्वेलरी कारोबार की परिस्थितियों ने भी भूमिका निभाई।

De Beers की 2024 की कारोबारी रिपोर्ट में बताया गया था कि वैश्विक डायमंड ज्वेलरी की मांग में कमजोरी रही। कंपनी ने खनन उत्पादन भी घटाया और बाजार की परिस्थितियों के अनुरूप सप्लाई को समायोजित किया। इसका मतलब है कि तकनीक से तैयार होने वाला सस्ता विकल्प प्राकृतिक हीरों पर प्रतिस्पर्धी दबाव बना सकता है, लेकिन कीमतों में गिरावट की पूरी कहानी समझने के लिए डिमांड, उत्पादन, स्टॉक और उपभोक्ताओं की पसंद को भी देखना जरूरी है।

लैब-ग्रोन हीरों की थोक कीमतों में 93% की गिरावट

De Beers की जून 2026 की द डायमंड रिपोर्ट (The Diamond Report) दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, 2020 के बाद से लैब-ग्रोन डायमंड्स की थोक कीमतों में करीब 93% की गिरावट आई है। रिपोर्ट में इनकी औसत थोक कीमत लगभग 100 डॉलर प्रति कैरेट बताई गई।

यहां एक बात समझना जरूरी है कि थोक कीमत और दुकान पर ग्राहक को मिलने वाली खुदरा कीमत एक जैसी नहीं होती। ज्वेलरी की खुदरा कीमत में डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग, ब्रांड, बिक्री और दूसरे खर्च भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए थोक कीमत में 93% गिरावट का अर्थ यह नहीं है कि हर लैब-ग्रोन हीरे की दुकान वाली कीमत भी उतनी ही गिर गई।

फिर भी इतने बड़े अंतर से यह पता चलता है कि तकनीक से तैयार होने वाले हीरों के बाजार में कीमतों को लेकर कितना बदलाव आया है। बढ़ती सप्लाई और प्रतिस्पर्धा ने उत्पाद को पहले के मुकाबले काफी सस्ता बना दिया है।

प्राकृतिक सोने की कीमतें गिरा सकता है?

यहीं से मैराथन फ्यूज़न (Marathon Fusion) के दावे का महत्व सामने आता है। कंपनी का कहना है कि फ्यूजन रिएक्शन से निकलने वाले न्यूट्रॉन की मदद से मर्करी-198 को मर्करी-197 में बदला जा सकता है, जो बाद में स्थिर सोना-197 में बदल जाता है। इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर ट्रांसम्यूटेशन कहा जाता है। यह सामान्य रासायनिक प्रक्रिया नहीं है। किसी धातु को पिघलाकर या उसमें दूसरे रसायन मिलाकर सोना नहीं बनाया जा सकता। इसके लिए परमाणु के केंद्र में बदलाव करना पड़ता है।

CERN के वैज्ञानिक पहले भी परमाणु स्तर पर सोने के नाभिक तैयार कर चुके हैं। हालांकि, वहां बने नाभिक बेहद कम समय में टूट गए थे और उनकी मात्रा व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए नगण्य थी। Marathon Fusion का दावा है कि उसकी प्रस्तावित तकनीक से सोने का उत्पादन बड़े स्तर पर करने की संभावना हो सकती है। लेकिन कंपनी ने अपने हालिया प्रयोग में बने सोने की मात्रा और विस्तृत डेटा अभी सार्वजनिक नहीं किया है।

इसलिए अभी यह कहना संभव नहीं है कि लैब में बना सोना प्राकृतिक सोने के बाजार को कितनी चुनौती दे सकता है। इसके लिए तकनीक का स्वतंत्र सत्यापन, बड़े स्तर पर उत्पादन और लागत का स्पष्ट होना जरूरी है।

सोने के बाजार में हीरों जैसा बदलाव क्यों आसान नहीं?

लैब-ग्रोन डायमंड्स और लैब में बनाए जाने वाले सोने के बीच एक अहम अंतर है। हीरों को लैब में तैयार करने की तकनीक पहले से व्यावसायिक स्तर पर इस्तेमाल हो रही है। इसके उलट, मर्करी से सोना बनाने की तकनीक के व्यावसायिक स्तर पर सफल होने का अभी ठोस प्रमाण सामने नहीं आया है।

मैराथन फ्यूज़न (Marathon Fusion) के 2025 के शोधपत्र में अनुमान लगाया गया है कि एक गीगावाट थर्मल पावर क्षमता वाला संयंत्र सालाना करीब दो टन सोना बना सकता है। लेकिन यह एक अनुमानित उत्पादन क्षमता है, मौजूदा व्यावसायिक उत्पादन नहीं। तुलना के लिए, वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, दुनिया की खदानों ने 2025 में करीब 3,672 टन सोना उत्पादित किया था। यानी अनुमानित 2 टन सालाना उत्पादन भी वैश्विक खनन की तुलना में बहुत छोटा होगा। इसके अलावा, इस स्तर का उत्पादन करने के लिए जिस प्लांट की जरूरत होगी, वह कंपनी की फिलहाल बताई गई क्षमता से बहुत बड़ा होगा।

एक और चुनौती सुरक्षा की है। शोधपत्र में अनुमान लगाया गया है कि तैयार सोने में रेडियोएक्टिव आइसोटोप रह सकते हैं, जिन्हें सुरक्षित स्तर तक आने देने के लिए कुछ परिस्थितियों में सात से 17 साल तक भंडारण की जरूरत पड़ सकती है। यह समय और लागत दोनों बढ़ा सकता है। इसलिए तकनीक से सोना बनाना वैज्ञानिक रूप से संभव होने और उसे कम लागत पर बड़े पैमाने पर बेच पाना-दोनों में बड़ा अंतर है।

सोने की कीमतों पर अभी किसका ज्यादा असर पड़ता है?

फिलहाल सोने की कीमतों के लिए ब्याज दरों की उम्मीदें, डॉलर की चाल, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, निवेशकों की मांग और वैश्विक अनिश्चितता जैसे कारक ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। मैराथन फ्यूजन (Marathon Fusion) का दावा भविष्य में सोने की सप्लाई को लेकर नई संभावना जरूर पैदा करता है, लेकिन अभी इसका बाजार पर वास्तविक असर मापने के लिए पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। कंपनी के प्रयोग के आंकड़े, उत्पादन की लागत और व्यावसायिक क्षमता स्पष्ट होने के बाद ही इसके संभावित असर का आकलन किया जा सकेगा। इसलिए अगर सोने की कीमतों में गिरावट आती है, तो उसे सीधे लैब में सोना बनाने की तकनीक से जोड़ना सही नहीं होगा। बाजार में पहले से मौजूद मांग और सप्लाई के कारकों को भी देखना होगा।

निवेशकों और खरीदारों के लिए क्या है मतलब?

सोना खरीदने वालों के लिए फिलहाल लैब में सोना बनने की खबर से ज्यादा जरूरी मौजूदा कीमत, खरीदारी का उद्देश्य और निवेश की अवधि है। इसी तरह प्राकृतिक हीरे खरीदने वालों को यह समझना चाहिए कि लैब-ग्रोन हीरे सस्ते होने से प्राकृतिक हीरों की मांग और कीमतों पर प्रतिस्पर्धी दबाव पड़ सकता है, लेकिन दोनों की कीमतें एक ही स्तर पर नहीं चलतीं।

लैब-ग्रोन डायमंड्स ने दिखाया है कि तकनीक और बढ़ती सप्लाई किसी बाजार की कीमतों को बदल सकती है। प्राकृतिक हीरों की कीमतों पर भी दबाव पड़ा, लेकिन इसमें कमजोर मांग और अन्य कारोबारी कारणों की भूमिका रही। मैराथन फ्यूजन (Marathon Fusion) का लैब में सोना बनाने का दावा अभी शुरुआती चरण में है। जब तक बड़े पैमाने पर उत्पादन और उसकी लागत साबित नहीं होती, तब तक सोने की कीमतों में हीरों जैसी गिरावट की भविष्यवाणी करना जल्दबाजी होगी।

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