आईआईटी रोपड़ की पीएचडी में अब छात्रों को लंबी चौड़ी थीसिस लिखने में सालों बर्बाद करने की जरूरत नहीं

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इंडस्ट्री में डिग्री की बजाय स्किल्स की डिमांड और एआई के दौर में बीच हायर एजुकेशन में रिसर्च के तौर तरीके भी बदल रहे हैं। मौजूदा ट्रेंड को देखते हुए आईआईटी रोपड़ ने इनोवेशन बेस्ड पीएचडी की नई शुरुआत की है। इस सिस्टम में शोधार्थियों को लंबी थीसिस लिखने के बजाय प्रोडक्ट बनाने, पेटेंट हासिल करने, स्टार्टअप शुरू करने या टेक्नोलॉजी को इंडस्ट्री तक पहुंचाने पर ध्यान देने का अवसर मिलेगा। वे स्किल्स और प्रैक्टिकल ज्ञान पर फोकस करेंगे। उन्हें लंबी चौड़ी थीसिस लिखने में सालों बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। वे इंडस्ट्री से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने और उन पर रिसर्च करने पर ध्यान दे सकते हैं।

आईआईटी रोपड़ के डायरेक्टर प्रोफेसर राजीव आहूजा ने इनोवेशन ड्रिवन (नवाचार पर आधारित) PhD का विचार पेश किया है। उनके इस आइडिया को अब संस्थान की डॉक्टोरल शिक्षा प्रणाली में PhD प्रोग्राम के एक नए तरीके के रूप में शामिल किया गया है। संस्थान ने प्रोडक्ट/स्टार्टअप-ड्रिवन PhD का एक नया रास्ता निकाला है, जिसके तहत डॉक्टोरल रिसर्च के जरिए कोई प्रोडक्ट बनाया जा सकता है, तकनीक को व्यावहारिक रूप दिया जा सकता है, या कोई स्टार्टअप शुरू किया जा सकता है। इस पद्धति में PhD की डिग्री उन रिसर्च नतीजों के आधार पर दी जाएगी, जो किसी प्रोडक्ट या स्टार्टअप को बनाने, उनके विकास और उसे बड़े लेवल पर ले जाने से जुड़े हों।

चीन में पहले से ही इस तरह की पीएचडी

ऐसा नहीं है कि विदेशों में इस तरह का कोई उदाहरण पहले से मौजूद नहीं है। चीन ने हाल ही में एक ऐसा तरीका अपनाया है, जिसमें चुने गए डॉक्टोरल कैंडिडेट्स किसी व्यावहारिक उपलब्धि जैसे कि कोई नया प्रोडक्ट, तकनीक या प्रोजेक्ट के आधार पर अपनी डिग्री पूरी कर सकते हैं।

फरवरी 2026 में नेचर (Nature) ने चीन की पहली प्रैक्टिकल PhD डिग्रियों के बारे में रिपोर्ट दी थी। इसमें सिविल इंजीनियरिंग के एक ऐसे स्कॉलर का जिक्र था जिसने लिखित थीसिस के बजाय एक ब्रिज-पायलॉन (पुल के खंभे) प्रोडक्ट को पेश करके अपनी पीएचडी पूरी की। इस मॉडल का मकसद शोधार्थियों को केवल रिसर्च पेपर प्रकाशित करने के दबाव से मुक्त करना भी है।

IIT रोपड़ के डायरेक्टर प्रोफेसर राजीव आहूजा का मानना है कि रिसर्च पेपर छापने का अत्यधिक दबाव कुछ मामलों में डेटा में हेरफेर और साहित्यिक चोरी जैसी समस्याओं को बढ़ावा दे सकता है। इसके बजाय शोध का मूल्यांकन उसके प्रैक्टिकल रिजल्ट के आधार पर किया जा सकता है। उन्होंने इंडिया टुडे को बताया कि इस नए मॉडल के तहत किसी स्कॉलर को कोई PhD थीसिस लिखने की जरूरत नहीं है। संस्थान का कहना है कि एक स्कॉलर अपने डॉक्टोरल काम के मुख्य नतीजे के तौर पर कोई प्रोडक्ट विकसित कर सकता है, स्टार्टअप शुरू कर सकता है, या कोई पेटेंट हासिल कर सकता है। प्रोफेसर आहूजा ने इस सिद्धांत को बहुत सरल शब्दों में समझाया- ‘आपके पास पूरी आजादी है। आपका सिर्फ एक ही लक्ष्य है। आप कोई प्रोडक्ट बेचें, 10 लाख रुपये कमाएं और मुझे दिखाएं। आपको PhD मिल जाएगी।’

उन्होंने आगे कहा, ‘अगर किसी छात्र को कोई प्रोडक्ट विकसित करने और उससे 10 लाख रुपये कमाने का लक्ष्य दिया जाए और वह छात्र इसे हासिल कर लेता है तो वह PhD के लिए योग्य हो सकता है।’

ऐसा करने वाला आईआईटी रोपड़ बना पहला आईआईटी

प्रोफेसर गुम्फेकर ने बताया कि भारत में फिलहाल कोई अन्य IIT ऐसा प्रोग्राम नहीं चला रहा है जबकि BITS पिलानी का WHILSP प्रोग्राम कुछ हद तक इसी तरह का एक रास्ता देता है। स्टार्टअप को मिलेगा संस्थान का सहयोग

आईआईटी रोपड़ के इनोवेशन इकोसिस्टम में स्नातक छात्रों, शिक्षकों और शोधार्थियों के विचारों को प्रोटोटाइप और स्टार्टअप में बदलने के लिए सहायता दी जाती है। इसमें उपकरण, तकनीकी सहयोग, मेंटर और निवेशकों तक पहुंच शामिल है। प्रोफेसर आहूजा के मुताबिक, इनक्यूबेशन कार्यक्रम आमतौर पर दो साल तक चलता है। इस दौरान स्टार्टअप को अपने उत्पाद और कारोबार को आगे बढ़ाने का अवसर मिलता है। निवेशकों के साथ कम से कम हर तिमाही बैठकें आयोजित की जाती हैं। संस्थान अपने सहयोग से विकसित होने वाले कुछ स्टार्टअप में लगभग 2 से 4 प्रतिशत इक्विटी भी ले सकता है।

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