मक्का समझौते को लेकर तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान घर में ही घिर गए

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पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ मक्का समझौता करके तुर्किए के राष्ट्रपति ने वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन अब इसी समझौते के लिए उन्हें जमकर विरोध का सामना करना पड़ा है। विपक्षी सांसदों ने तुर्किए के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए पूरा है कि अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो क्या तुर्किए इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल होगा? इतना ही नहीं विपक्षी नेता ने चेतावनी दी कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ हुआ समझौता तुर्किए को युद्ध के एक ऐसे जंजाल में फंसा सकता है, जिसे उसने नहीं चुना।

तुर्किए की संसद में मक्का समझौते के ऊपर हो रही वोटिंग के दौरान विपक्षी सांसदों ने एर्दोगान सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई। तुर्किए की विपक्षी सासंद गुलिस्तान किलिक कोसीगिट ने सीधा सवाल उठाया कि क्या भारत और पाकिस्तान के युद्ध में तुर्किए को भी उतरना होगा? उन्होंने भारत और पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की तरफ संकेत करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान का युद्ध का इतिहास काफी पुराना है। ऐसे में तुर्किए की सरकार यह फैसला कैसे लेगी कि किसी युद्ध में सेना भेजना है या अगर मदद करनी है, तो किस हद तक करनी है?

पाकिस्तान ने मदद मांगी, तो तुर्किए की प्रतिक्रिया कैसे तय होगी?

तुर्किए, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए इस समझौते में अभी तक मदद की स्थिति पर कोई स्पष्ट बात सामने नहीं आई है। ऐसे में तुर्किए की संसद में भी इसे लेकर सवाल उठाया गया कि अगर भारत के खिलाफ संघर्ष में पाकिस्तान मदद मांगता है, तो तुर्किए की प्रतिक्रिया क्या होगी और वह किस स्थिति तक मदद करने के लिए तैयार होगा। इसके अलावा यह कौन तय करेगा कि तुर्किए किस तरीके से मदद करेगा।

एर्दोगान सरकार की तरफ से इस सवाल का जवाब दिया गया है। संसद में विदेश मामलों के अधिकारी फुअत ओकताय ने कहा कि तुर्किए को उसकी मर्जी के खिलाफ किसी भी युद्ध में शामिल नहीं किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया किसी भी युद्ध की स्थिति में सैनिकों की तैनाती के लिए संसद में वोटिंग होगी। हालांकि, इस समझौते के ऊपर अभी हुई वोटिंग के आधार पर खुफिया जानकारी साझा करना, सैन्य सहयोग और रक्षा उद्योग का आदान-प्रदान किया जा सकता है। बता दें, मक्का समझौते के ऊपर तुर्किए की संसद में वोटिंग हुई थी। गुरुवार को लाए गए इस प्रस्ताव को तुर्किए की संसद ने 279 वोटों से पास कर दिया। विपक्षी सांसदों ने इसके खिलाफ विरोध किया और 119 ने विरोध में वोटिंग की। इस वोटिंग के बाद तुर्किए के अधिकारियों ने साफ किया कि इस वोटिंग के आधार पर तुर्किए की सेना को कहीं नहीं भेजा जाएगा। भविष्य में अगर तुर्किए की सेना को भेजने की जरूरत होगी, तो उसके लिए संसद में अलग से वोटिंग होगी। मक्का समझौते पर घर में ही घिरे एर्दोगान, भारत से युद्ध की आशंका पर तुर्किए में जमकर विरोध

Nov 06, 2026 08:06 pm IST

By Upendra Thapakलाइव हिन्दुस्तान

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मक्का समझौते को लेकर तुर्किए के राष्ट्रपति एर्दोगान घर में ही घिर गए हैं। नेताओं ने भारत के साथ युद्ध की आशंका पर सवाल उठाते हुए कहा है कि पाकिस्तान मदद मांगेगा, तो तुर्किए की प्रतिक्रिया कैसे तय होगी?

Pakistan and Turkey rapid deployment of troops to Saudi Arabia

मक्का समझौते पर घर में ही घिरे एर्दोगान, भारत से युद्ध की आशंका पर तुर्किए में जमकर विरोध

पाकिस्तान और सऊदी अरब के साथ मक्का समझौता करके तुर्किए के राष्ट्रपति ने वैश्विक स्तर पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की है। लेकिन अब इसी समझौते के लिए उन्हें जमकर विरोध का सामना करना पड़ा है। विपक्षी सांसदों ने तुर्किए के इस फैसले पर सवाल उठाते हुए पूरा है कि अगर भारत पाकिस्तान पर हमला करता है, तो क्या तुर्किए इस युद्ध में सीधे तौर पर शामिल होगा? इतना ही नहीं विपक्षी नेता ने चेतावनी दी कि सऊदी अरब और पाकिस्तान के साथ हुआ समझौता तुर्किए को युद्ध के एक ऐसे जंजाल में फंसा सकता है, जिसे उसने नहीं चुना।

तुर्किए की संसद में मक्का समझौते के ऊपर हो रही वोटिंग के दौरान विपक्षी सांसदों ने एर्दोगान सरकार को जमकर खरी-खोटी सुनाई। तुर्किए की विपक्षी सासंद गुलिस्तान किलिक कोसीगिट ने सीधा सवाल उठाया कि क्या भारत और पाकिस्तान के युद्ध में तुर्किए को भी उतरना होगा? उन्होंने भारत और पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की तरफ संकेत करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान का युद्ध का इतिहास काफी पुराना है। ऐसे में तुर्किए की सरकार यह फैसला कैसे लेगी कि किसी युद्ध में सेना भेजना है या अगर मदद करनी है, तो किस हद तक करनी है?

पाकिस्तान ने मदद मांगी, तो तुर्किए की प्रतिक्रिया कैसे तय होगी?

तुर्किए, पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच हुए इस समझौते में अभी तक मदद की स्थिति पर कोई स्पष्ट बात सामने नहीं आई है। ऐसे में तुर्किए की संसद में भी इसे लेकर सवाल उठाया गया कि अगर भारत के खिलाफ संघर्ष में पाकिस्तान मदद मांगता है, तो तुर्किए की प्रतिक्रिया क्या होगी और वह किस स्थिति तक मदद करने के लिए तैयार होगा। इसके अलावा यह कौन तय करेगा कि तुर्किए किस तरीके से मदद करेगा।

एर्दोगान सरकार की तरफ से इस सवाल का जवाब दिया गया है। संसद में विदेश मामलों के अधिकारी फुअत ओकताय ने कहा कि तुर्किए को उसकी मर्जी के खिलाफ किसी भी युद्ध में शामिल नहीं किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया किसी भी युद्ध की स्थिति में सैनिकों की तैनाती के लिए संसद में वोटिंग होगी। हालांकि, इस समझौते के ऊपर अभी हुई वोटिंग के आधार पर खुफिया जानकारी साझा करना, सैन्य सहयोग और रक्षा उद्योग का आदान-प्रदान किया जा सकता है।

बता दें, मक्का समझौते के ऊपर तुर्किए की संसद में वोटिंग हुई थी। गुरुवार को लाए गए इस प्रस्ताव को तुर्किए की संसद ने 279 वोटों से पास कर दिया। विपक्षी सांसदों ने इसके खिलाफ विरोध किया और 119 ने विरोध में वोटिंग की। इस वोटिंग के बाद तुर्किए के अधिकारियों ने साफ किया कि इस वोटिंग के आधार पर तुर्किए की सेना को कहीं नहीं भेजा जाएगा। भविष्य में अगर तुर्किए की सेना को भेजने की जरूरत होगी, तो उसके लिए संसद में अलग से वोटिंग होगी।

सऊदी अरब और यमन के खिलाफ लड़ने की आशंका पर एर्दोगान सरकार ने साफ किया कि वह यमन ने तुर्किए सैनिकों को नहीं भेजेंगे।

मक्का समझौते को लेकर घरेलू स्तर पर संकट में एर्दोगान

तुर्किए के राष्ट्रपति ने वैश्विक स्तर पर अपने प्रभाव को बढ़ाने के लिए भले ही मक्का समझौता कर लिया है लेकिन घरेलू स्तर पर उन्हें इसके लिए विरोध का सामना करना पड़ रहा है। विपक्षी नेता ने आरोप लगाया कि मक्का समझौते के तहत एर्गोदान ने तुर्किए सैनिकों को यमन के रेगिस्तान में भेजने पर सहमति जता दी है। इतना ही नहीं कोसिगट ने आरोप लगाया कि सऊदी अरब को इस समझौते में शामिल होने का मतलब है कि तुर्किए अब ईरान के साथ ही संघर्ष बढ़ा रहा है, जबकि ईरान की सीमा भी तुर्किए से लगती है। हालांकि, कोसीगेट के इस दावे का जवाब देते हुए एर्दोगान के अधिकारियों ने साफ किया कि यह समझौता केवल रक्षात्मक प्रकृति का है, यह किसी तीसरे देश को निशाने पर रखकर नहीं बनाया गया है।

मक्का समझौता का क्या होगा प्रभाव

पाकिस्तान, शुरुआत से ही इस्लामिक नाटो की परिकल्पना को हकीकत में उतारने की कोशिश करता रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद उसने सबसे पहले सऊदी अरब को इस मामले में मना लिया। सऊदी अरब, जो कि अमेरिका के ऊपर से अपनी सुरक्षात्मक गतिविधियों को कम करना चाहता था, उसके लिए यह एक गोल्डन मौका था। क्योंकि चीन के सामने आने पर अमेरिका के नाराज होने का खतरा था। ऐसी स्थिति में सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच में यह समझौता हो गया। कुछ ही समय पर तुर्किए ने भी इस समझौते के लिए हामी भर दी। तीन देशों के बीच हुए इस समझौते में स्पष्ट किया गया कि किसी भी एक देश पर हमला तीनों देशों के ऊपर माना जाएगा। हालांकि, इस समझौते की पोल उस वक्त खुल गई, जब सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों ने हमला करना शुरू कर दिया। तुर्किए और पाकिस्तान केवल कड़ी निंदा करते रह गए। हालांकि, बाद में दोनों ने स्पष्ट किया कि मदद का ऑफर दिया गया था।

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