यह भारत के इतिहास में किसी एक अपार्टमेंट/पेंटहाउस (सिंगल रेजिडेंशियल यूनिट) की अब तक की सबसे महंगी खरीद बन गई है। इसके साथ ही इस बात पर भी बहस शुरू हो गई है कि क्या देश में सस्ते यानी अफोर्डेबल मकानों का बनना बंद हो गया है? काफी बिल्डर अब अफोर्डेबल मकान बनाना ही नहीं चाहते। सीए नितिन कौशिक ने इसके कारणों का खुलासा किया है।
सीए नितिन कौशिक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हाल ही में एक पोस्ट की है। उन्होंने बताया है कि भारत के बड़े शहरों में मिडिल क्लास के लिए 50 लाख रुपये तक के किफायती मकान तेजी से खत्म हो रहे हैं। उनका कहना है कि यह समस्या केवल मकानों के महंगे होने की नहीं है, बल्कि बिल्डरों के पास अब किफायती मकान बनाने का आर्थिक फायदा कम होता जा रहा है। अफोर्डेबल मकानों की हिस्सेदारी तेजी से घटी
- नितिन कौशिक के मुताबिक, भारत के टॉप 7 शहरी बाजारों में अफोर्डेबल हाउसिंग की बिक्री और सप्लाई में बड़ी गिरावट आई है।
- साल 2018 में भारत के टॉप-7 शहरों में कुल मकान बिक्री और नई सप्लाई में किफायती मकानों की हिस्सेदारी करीब 38% से 40% हुआ करती थी।
- साल 2023–24 में इसमें बड़ी गिरावट आई। इस दौरान यह आंकड़ा घटकर 17% से 19% पर आ गया के आंकड़ों का हवाला देते हुए नितिन कौशिक ने बताया कि साल 2026 की दूसरी तिमाही तक नए लॉन्च होने वाले घरों में अफोर्डेबल हाउसिंग की हिस्सेदारी सिर्फ करीब 6% रह गई।
महंगे मकान बनाना ज्यादा फायदेमंद
इसके पीछे सबसे बड़ी वजह मुनाफे का अंतर है। आमतौर पर अफोर्डेबल हाउसिंग प्रोजेक्ट में करीब 10 से 12% का मार्जिन मिलता है। वहीं प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट में यह मार्जिन 25 से 35% या उससे ज्यादा हो सकता है।
हालांकि दोनों तरह के प्रोजेक्ट में बिल्डर को लगभग एक जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इनमें जमीन खरीदने की लागत, निर्माण खर्च, मंजूरी में देरी, फाइनेंसिंग की लागत और प्रोजेक्ट पूरा करने का जोखिम शामिल है।
ऐसे में 40 लाख रुपये के घर पर मिलने वाला कम मार्जिन बिल्डर के लिए उतने जोखिम को सही ठहराना मुश्किल बना देता है। यही कारण है कि डेवलपर्स महंगे मकानों की ओर ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। शहरों के बाहर हो सकता है समाधान
अफोर्डेबल हाउसिंग की समस्या का एक समाधान शहरों के बाहरी इलाकों में मकानों की सप्लाई बढ़ाना हो सकता है। इसकी वजह यह है कि शहर के मुख्य इलाकों की तुलना में बाहरी क्षेत्रों में जमीन अपेक्षाकृत सस्ती होती है।
हालांकि इसके लिए बेहतर ट्रांसपोर्ट और रोजगार केंद्रों से कनेक्टिविटी जरूरी होगी। इसके लिए मेट्रो और नेटवर्क का विस्तार, सरकारी जमीन का इस्तेमाल, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के जरिए अफोर्डेबल हाउसिंग और ट्रांजिट के आसपास ज्यादा घनत्व वाली बसावट जैसे कदम उठाए जा सकते हैं।






















































