गोबरधन योजना से आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश के गाँव रू स्वच्छता, समृद्धि और हरित ऊर्जा का उभरता नया मॉडल

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रायबरेली : उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में इन दिनों एक ऐसी विकास यात्रा आकार ले रही है, जो न केवल गाँवों की सूरत बदल रही है, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का एक वैश्विक मानक भी स्थापित कर रही है। राज्य सरकार की दूरदर्शी ‘गोबरधन योजना’ के माध्यम से प्रदेश की ग्राम पंचायतें आज स्वच्छता, पर्यावरण संरक्षण और वित्तीय सशक्तिकरण का एक ऐसा त्रिकोणीय मॉडल प्रस्तुत कर रही हैं, जिसकी गूँज पूरे देश में सुनाई दे रही है। यह योजना ‘कचरे से कंचन’ (वेस्ट टू वेल्थ) की परिकल्पना को धरातल पर उतारने का सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरी है, जहाँ पशुओं के गोबर और जैविक कचरे के वैज्ञानिक प्रबंधन के जरिए गाँवों में न केवल स्वच्छ वातावरण सुनिश्चित किया जा रहा है, बल्कि ऊर्जा और उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद का उत्पादन कर पंचायतों की आय के स्थायी स्रोत भी विकसित किए जा रहे हैं।
सांख्यिकीय दृष्टि से इस योजना की सफलता के आंकड़े अत्यंत उत्साहजनक हैं। फरवरी 2026 तक के प्राप्त विवरणों के अनुसार, उत्तर प्रदेश की विभिन्न ग्राम पंचायतों ने जैविक खाद और बायोगैस से जुड़े अन्य उत्पादों की बिक्री के माध्यम से 28 लाख रुपये से अधिक की कुल आय अर्जित कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। यह वित्तीय उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पंचायतों की स्वयं की आय (OSR&Own Source Revenue) में अभूतपूर्व बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे वे स्थानीय विकास कार्यों के लिए शासन की अनुदान राशि पर अपनी निर्भरता को कम करने में सफल हो रही हैं। आय सृजन के इस प्रतिस्पर्धी परिवेश में बुंदेलखंड का ललितपुर जिला वर्तमान में प्रदेश के शीर्ष पायदान पर है, जहाँ की पंचायतों ने कुल 3,37,990 रुपये की शुद्ध आय अर्जित की है। इसी क्रम में श्रावस्ती जिला 2,87,036 रुपये और रामपुर जिला 1,23,400 रुपये की आय के साथ क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर बने हुए हैं, जो इस योजना की क्षेत्रीय स्वीकार्यता और सफलता को प्रमाणित करते हैं।
तकनीकी और ढांचागत विस्तार की बात करें तो पंचायती राज विभाग द्वारा अब तक प्रदेश के 74 जनपदों में कुल 116 अत्याधुनिक बायोगैस संयंत्र सफलतापूर्वक स्थापित किए जा चुके हैं। इनमें से एक बड़ी संख्या उन संयंत्रों की है जिन्हें विशेष रूप से सरकारी गौशालाओं के परिसर में लगाया गया है। यहाँ गोबर और रसोई कचरे जैसे जैविक अवशेषों को ‘एनेरोबिक डाइजेशन’ प्रक्रिया के माध्यम से स्वच्छ बायोगैस ईंधन में परिवर्तित किया जा रहा है। इस हरित ऊर्जा का उपयोग केवल रसोई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण उद्योगों की रीढ़ बन रही है। उदाहरण स्वरूप, रामपुर जिले में बायोगैस ऊर्जा की सहायता से तेल पिराई मशीनें संचालित की जा रही हैं, जबकि आगरा, बुलंदशहर, बांदा, सोनभद्र और हरदोई जैसे जनपदों में बायोगैस आधारित आटा चक्कियों का संचालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति दे रहा है। स्थानीय स्तर पर बायोगैस से संचालित ये चक्कियाँ और मशीनें ग्रामीणों को सस्ती सेवा तो प्रदान कर ही रही हैं, साथ ही पंचायत के लिए नियमित राजस्व और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर रही हैं।
पर्यावरण और कृषि के दृष्टिकोण से गोबरधन योजना एक ‘गेम चेंजर’ सिद्ध हो रही है। संयंत्रों से निकलने वाली स्लरी (अवशेष) को परिष्कृत कर जो जैविक खाद तैयार की जा रही है, वह किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। इस जैविक खाद के निरंतर उपयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता पुनर्जीवित हो रही है और खेती की लागत में भारी कमी आई है, जिससे किसान रासायनिक उर्वरकों के चंगुल से मुक्त होकर ‘विषमुक्त खेती’ की ओर अग्रसर हो रहे हैं। स्वच्छ ऊर्जा का यह व्यापक प्रसार न केवल ग्रामीण परिवेश में कार्बन फुटप्रिंट को कम कर रहा है, बल्कि खुले में गोबर फेंकने से होने वाली गंदगी और बीमारियों पर भी प्रभावी अंकुश लगा रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार की यह पहल गाँवों को मात्र स्वच्छ बनाने का अभियान नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर आर्थिक इकाइयों के रूप में विकसित करने का एक संपूर्ण रोडमैप है। जब ग्राम पंचायतें अपने स्वयं के संसाधनों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग कर ऊर्जा और खाद पैदा करती हैं, तो वे वास्तव में महात्मा गांधी के ‘ग्राम स्वराज’ और प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के स्वप्न को सार्थकता प्रदान करती हैं। गोबरधन योजना आज उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में संसाधनों के अधिकतम उपयोग, स्वच्छता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता और सामुदायिक खुशहाली का एक ऐसा सशक्त मॉडल बनकर उभरी है, जो आने वाले समय में विश्व स्तर पर ग्रामीण विकास की नई परिभाषा गढ़ेगा।

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