रायबरेली : “इदार-ए-ऐहबाब” रायबरेली की मासिक गोष्ठी का आयोजन बाबू कृष्णा नंद अदीब की अध्यक्षता में केएन लान रायबरेली में हुआ जिसका संचालन मोहम्मद लईक अंसारी ने किया। गोष्ठी में प्रख्यात शायर शिव बहादुर सिंह दिलबर के ग़ज़ल संग्रह “शबिस्तान-ए-गज़ल”का विमोचन हुआ। ” साहिर लुधियानवी की नज़्म निगारी”शीर्षक पर लईक अंसारी और माजिद निसार आशती ने आलेख प्रस्तुत किए। दिये गये मिसरए तरह “अमीर-ए-शहर ने दावत कुबूल कर ली है” पर कवियों और शायरों ने ग़ज़लें प्रस्तुत कीं। श्रोताओं द्वारा पसंद किए गए अशआर निम्नवत हैं–
ख़फ़ा न मुझसे वो हो जाए इसलिए मैंने
“अमीर-ए-शहर की दावत कुबूल कर ली है
बाबू कृष्णा नंद श्रीवास्तव
यूं ही नहीं ये खामोशी है मेरे चेहरे पर
ये सब तुम्हारी बदौलत कुबूल कर ली है
हसन रायबरेलवी
अब आगे जो भी हो अंजाम देगा जायेगा
“अमीर-ए-शहर की दावत कुबूल कर ली है
हसन अब्बास जाएगी
हूक़ूक़ जिसने अदा कर दिए पड़ोसी के
ख़ुदा ने उसकी इबादत कुबूल कर ली है
मोहम्मद लईक अंसारी
जुनूं नहीं है तो फिर क्या है एय अज़ीज़ कहो
कि सर ने संग की निस्बत कुबूल कर ली है
डाक्टर अज़ीज़ खैराबादी
ये कैसे आ गए पुरखार रास्ते पर हम
ये हमने किसकी कयादत कुबूल कर ली है
रेहाना आतिफ
चला है ज़ोर मुकद्दर के सामने किसका
हर एक ने ये हक़ीक़त कुबूल कर ली है
सलमान अब्बास आग़ा जाएगी
लगे हैं आंख दिखाने मुझे भिखारी भी
कि जबसे मैंने शराफत कुबूल कर ली है
शिव बहादुर सिंह दिलबर
ज़मीर से यूं फराग़त कुबूल कर ली है
भटक रही ये सियासत कुबूल कर ली है
शब्बीर अहमद सूरी
लो ख़त्म हो गये सब ज़िन्दगी के अंदेशे
चलो कि श़ौक ने फुर्सत कुबूल कर ली है
हिदायत उल्ला शौक
वतन की इज़्ज़तो अज़मत के वास्ते मैंने
बड़ी ख़ुशी से शहादत कुबूल कर ली है
रमज़ान अली सफीर
दरीचा कोई भी दिल का कभी नहीं खोला
ज़रुर आपने ज़ुल्मत कुबूल कर ली है
अशोक श्रीवास्तव
मैं हो न जाऊं असीर आज उनकी जुल्फों का
ये डर है फिर भी मोहब्बत कुबूल कर ली है
इसरार अहमद खान
वो अहले दिल हों कि अंतराल इस ज़माने के
सभी की हमने मोहब्बत कुबूल कर ली है
माजिद निसार आशती
अज़ल से जारी है ये सिलसिला इताअत का
कि ज़न के वास्ते रूख़सत कुबूल कर ली है
अबरार अहमद जाएगी
चुनाव बाद ये नेता न हमको पूछेंगे
मिली जो वोट की कीमत कुबूल कर ली है
राघवेन्द्र सिंह राघव
रहे मुकदमे अदालत में अब न सर उसके
सुना है उसने सियासत कुबूल कर ली है
प्रदीप प्यारे
यज़ीदियों से बगावत कुबूल कर ली है
हुसैनियों ने शहादत कुबूल कर ली है
ज़मीर अंसारी
ये जान जायेगी मेरी वतन की अज़मत पर
वतन पे अपनी शहादत कुबूल कर ली है
हफीज़ अमेठी
खिले हैं फूल कहीं खुशबुओं के डेरे हैं
रज़ा ख़ुदा की है जन्नत कुबूल कर ली है
राजेन्द्र बहादुर सिंह राज





























































