रायबरेली : शिक्षक और शिक्षक दिवस शब्द और तिथि मन में आते ही, हमें सभी गुरुजनों की याद एक पल में आ जाती है जिससे कुछ खट्टी तो कुछ मीठी स्मृतियां भी जुड़ी होती हैं, फिर भी गुरु तो गुरु है। उसका स्थान ईश्वर से भी ऊपर माना गया है। कबीर दास ने तो कहा था–
“सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।।”
अर्थात संत कबीर दास ने गुरु का जो स्थान बता दिया है उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। दूसरे पल मेरे मन में विचार आता है कि पहली गुरु तो मां है, जिन्होंने हमें हंसना–खेलना बोलना चलना सिखाया है। यहां तक कागज, कलम, दवात, चॉक आदि पकड़ना भी मां ने ही सिखाया है।
जिस प्रकार कुम्हार मिट्टी का घड़ा बनाते समय घड़े को बाहर–बाहर से मारता है तो अंदर हाथ लगाकर थपथपाता भी है। यदि हमारा शिष्य गलती करता है, तो उसे समझाना, सही आकार देना गुरु का कर्तव्य है, उसी प्रकार माता और पिता गुरु के समान है। पिता अगर अपने पुत्र पुत्री को बाहर से डांटता, फटकारता है तो, माता उसके अंदर व्याप्त भावनाओं को हाथ से थपथपा कर समझाती, दुलारती, प्यार करती और गलती होने का एहसास भी कराती है।
शिक्षक दिवस हम भारत के द्वितीय राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जन्म दिवस को मनाते हैं।
भारत के पहले उप मंत्री राष्ट्रपति और दूसरे महामहिम राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय दार्शनिक, शिक्षाविद, सुलझे हुए राजनेता थे। आपका जन्म 5 सितंबर सन 1888 को हुआ था। डॉ सर्वपल्ली जी का शैक्षिक योगदान और महान मूल्यों का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने 1954 में सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया था। दुर्भाग्य से डॉ राधा कृष्णन रूपी नक्षत्र 17 अप्रैल सन 1975 को हमेशा के लिए अस्त हो चुका था।
राधाकृष्णन जी का जन्म और यह तारीख सभी भारतीयों के लिए सम्मान, स्नेह सत्कार का बोध कराती है। 5 सितंबर को हम अपने-अपने गुरुओं को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से याद करते हैं। यह तारीख मात्र नहीं, अपितु सम्मान व ज्ञान प्राप्ति की लकीर है।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम जहां भी जिस रूप में सुशोभित हैं, उसका मूल तत्व गुरु है। यदि वे न होते तो आज हम राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय नौकरियां, व्यापार न कर रहे होते। वैसे तो भारत की प्रथम गुरु माता सावित्रीबाई फुले को माना गया है, जिन्होंने महिलाओं बालिकाओं के लिए पहला स्कूल फातिमा शेख के सहयोग से खोला था। उस समय कुछ सामंतवादी लोग सावित्रीबाई फुले पर गोबर फेंकते थे, गंदगी फेंकते थे, अपशब्दों से नवाजते थे। फिर भी माता सावित्रीबाई अपने उद्देश्य से न डिगी, न रुकी। निरंतर कार्य करती रही। आज महिलाओं को संविधान की वजह से शिक्षा स्वास्थ्य रोजगार में बराबरी का अधिकार प्राप्त हो गया है।
गुरु भाई शिष्य आदमी यदि प्रेम का रिश्ता इसने का रिश्ता होता है तो दूसरी तरफ कुछ भाई डर का रिश्ता होना चाहिए। गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरितमानस में लिखा है कि “लखन हृदयँ लालसा बिसेषी। जाइ जनकपुर आइअ देखी॥
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥”
अर्थात छोटे भाई और शिष्य के अंदर किसी कार्य को करने से पहले गुरु व ज्येष्ठ भ्राता का आदर सम्मान साथ ही कुछ अहसास रूपी भय भी बना रहना चाहिए।
डॉ0 सोनिका, अंबाला हरियाणा
डॉ अशोक कुमार, रायबरेली





























































